‘इस्लामिक कोर्ट’ को तलाक देने का अधिकार है या नहीं? हाईकोर्ट के आदेश से साफ हुआ मामला

बिलासपुर : शरिया कोर्ट यानी दारुल कजा से जारी तलाक के फरमान को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने शरिया कोर्ट के तलाक संबंधी आदेश पर रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि देश के कानून में इस तरह के किसी ‘इस्लामिक कोर्ट’ के गठन का प्रावधान नहीं है और उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत तलाक देने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
मामले की अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
क्या है पूरा मामला?
बिलासपुर निवासी उज्मा बानो, पति रजा रहमान, ने इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि इदारा ए-शरिया दारुल कजा की मुहर और आदेश के आधार पर उन्हें दूसरा तलाक दिए जाने की बात कही गई है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के समक्ष इस तरह के तलाक के आदेश की वैधानिकता का सवाल उठा।
‘इस्लामिक कोर्ट’ को तलाक देने का अधिकार नहीं
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि देश के कानून में ‘इस्लामिक कोर्ट’ या दारुल कजा को अदालत की तरह कार्य करने और इस प्रकार की न्यायिक कार्यवाही करने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें दारुल कजा जैसी संस्थाओं के आदेशों को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई थी।
वैधानिक तलाक साबित होने तक विवाह मान्य
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक पति वैधानिक प्रक्रिया के तहत तलाक को साबित नहीं करता, तब तक दोनों को कानूनन विवाहित दंपती माना जाएगा।
अदालत के इस आदेश के बाद शरिया कोर्ट के कथित तलाक के फरमान की वैधानिकता पर भी सवाल खड़ा हो गया है।
अब मामले की अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को होगी। उस दौरान अदालत मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं पर सुनवाई करेगी।







