छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी- माता-पिता के अधिकार से ऊपर बच्चे का कल्याण, मां के पास ही रहेगी कस्टडी

बिलासपुर :  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सात साल के बच्चे की अभिरक्षा को लेकर चल रहे विवाद में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने पिता की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने बेटे को अपने पास रखने की गुहार लगाई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की कस्टडी तय करते समय माता-पिता के अधिकारों से ज्यादा उसकी भलाई और हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

हालांकि, अदालत ने पिता को बेटे से मिलने का रास्ता दिया है। इसके लिए पिता सार्वजनिक स्थान पर मुलाकात का अनुरोध कर सकेंगे, लेकिन उन्हें पहले मां को इसकी सूचना देनी होगी। मुलाकात का समय और स्थान मां की सहमति से ही तय होगा। जस्टिस सुषमा सावंत की पीठ ने बलौदाबाजार निवासी पिता की अपील का निराकरण करते हुए यह व्यवस्था दी।

तलाक के बाद मां के साथ रह रहा है बेटा

मामले के अनुसार, पिता ने पारिवारिक न्यायालय के 27 अगस्त 2024 के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पारिवारिक न्यायालय ने बेटे की अभिरक्षा मां के पास रखने के फैसले के खिलाफ पिता की याचिका खारिज कर दी थी।

दोनों का विवाह 28 अप्रैल 2015 को हुआ था और 7 फरवरी 2022 को उनका तलाक हो गया। इसके बाद से बेटा अपनी मां के साथ रह रहा है। पेशे से शिक्षक पिता ने अदालत में दलील दी थी कि वे बेटे को बेहतर शिक्षा और देखभाल दे सकते हैं। उनका परिवार संयुक्त है और घर के अन्य सदस्य भी बच्चे की परवरिश में सहयोग कर सकते हैं।

मां ने कहा- बेटे की पढ़ाई और परवरिश ठीक से कर रही हूं

पिता की मांग का विरोध करते हुए मां ने कहा कि वह बेटे की शिक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी ठीक से निभा रही हैं। बच्चा वर्तमान में दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है। मां ने यह आरोप भी लगाया कि पिता ने बच्चे के जन्म के बाद से उससे मिलने और उसकी देखभाल करने में पर्याप्त रुचि नहीं दिखाई। इसके अलावा, भरण-पोषण की राशि भी नियमित रूप से नहीं दी गई।

मां ने बच्चे की पढ़ाई जारी रहने के समर्थन में स्कूल फीस की रसीदें भी अदालत में पेश की थीं।

बच्चे का हित सबसे ऊपर, केवल शिक्षक होना पर्याप्त आधार नहीं

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि बच्चे की अभिरक्षा का फैसला करते समय माता-पिता के व्यक्तिगत अधिकारों से अधिक बच्चे का कल्याण महत्वपूर्ण है। केवल पिता का शिक्षक होना और बेहतर शिक्षा देने की क्षमता रखना इस बात का प्रमाण नहीं है कि मां के पास बच्चे की उपेक्षा हो रही है।

अदालत ने यह भी पाया कि बचपन से ही बच्चे का पिता के साथ सार्थक संपर्क नहीं रहा है। पारिवारिक न्यायालय में पेशी के दौरान भी बच्चे ने पिता के साथ जाने की इच्छा जाहिर नहीं की थी। ऐसे में उसके मौजूदा वातावरण को बदलने के लिए कोई ठोस वजह सामने नहीं आई।

हर सप्ताह या महीने मुलाकात तय करने से बढ़ सकता है विवाद

सुनवाई के दौरान पिता के वकील ने भी बेटे की अभिरक्षा की मांग पर जोर देने के बजाय मुलाकात का अधिकार देने की मांग की थी। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि हर सप्ताह या महीने मुलाकात का निश्चित कार्यक्रम तय करने से माता-पिता के बीच विवाद बढ़ सकता है और बच्चे पर मानसिक दबाव पड़ सकता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पिता को सार्वजनिक स्थान पर बेटे से मिलने का अनुरोध करने की अनुमति दी। इसके लिए उन्हें पहले मां को सूचना देनी होगी और समय व स्थान उनकी सहमति से तय करना होगा।

मां को बच्चे के हित में विचार करने की सलाह

हाईकोर्ट ने मां से अपेक्षा की कि वह बच्चे के हित को प्राथमिकता देते हुए पिता की मुलाकात संबंधी मांग पर सद्भावना से विचार करें। अदालत ने पारिवारिक न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसके तहत बच्चे की अभिरक्षा मां के पास ही रहेगी।

इस तरह हाईकोर्ट ने पिता की कस्टडी संबंधी अपील खारिज कर दी, लेकिन मुलाकात की व्यवस्था में सीमित संशोधन करते हुए मामले का निराकरण कर दिया।

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