विस्थापन पर बवाल: 36 परिवारों ने कलेक्टर से लगाई गुहार, कहा- जल-जंगल-जमीन छोड़कर नहीं जाएंगे

गरियाबंद : उदंती-सीतानदी अभ्यारण्य क्षेत्र में विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मामला विवादों में घिरता नजर आ रहा है। ग्रामीणों ने अभ्यारण्य प्रशासन पर विस्थापन को लेकर गांव में लोगों को तैयार करने और प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं देने का आरोप लगाया है। इसी मुद्दे को लेकर ग्राम देवझरअमली के 36 परिवारों के प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर रणवीर शर्मा से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा।
ग्रामीणों की मांग है कि विस्थापन से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को पेशा कानून (PESA), वन अधिकार अधिनियम (FRA) और ग्राम सभा के वैधानिक अधिकारों के अनुरूप आगे बढ़ाया जाए। वहीं कलेक्टर ने मामले में आगामी 21 सितंबर को होने वाली जिला स्तरीय समन्वय समिति की बैठक में चर्चा के बाद आगे की कार्रवाई तय करने का भरोसा दिलाया है।
17 सितंबर की बैठक के बाद बढ़ा विवाद
ग्रामीणों के मुताबिक, 17 सितंबर को अभ्यारण्य के उपनिदेशक और कलेक्टर की मौजूदगी में गांव में विस्थापन को लेकर बैठक हुई थी। ग्रामीणों का कहना है कि बैठक में गांव के सीमित संख्या में लोग ही शामिल हुए, जबकि बड़ी संख्या में ग्रामीण और स्थानीय आदिवासी प्रतिनिधि पूरी प्रक्रिया को लेकर अपनी बात रखना चाहते हैं।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की मांग है कि विस्थापन से पहले गांव में मौजूद भूमि की वैधानिक स्थिति, विस्थापन के आधार, नियम-शर्तों, पुनर्वास व्यवस्था और प्रभावित परिवारों को मिलने वाले अधिकारों से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए।
उनका कहना है कि जब तक पूरी प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती, तब तक विरोध जारी रहेगा।
‘विस्थापन नहीं, गांव में विकास चाहिए’
जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम और लोकेश्वरी नेताम के मुताबिक, ग्राम देवझरअमली में करीब 156 परिवार रहते हैं। इनमें से 36 परिवारों ने फिलहाल स्पष्ट रूप से विस्थापन के प्रति असहमति जताई है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह गांव उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि वे अपने पुरखों की जमीन और जल-जंगल-जमीन छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहते।
ग्रामीण लंबे समय से गांव में सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं की मांग करते रहे हैं। उनका आरोप है कि विकास कार्यों के दौरान विभागीय स्तर पर कई तरह की अड़चनें सामने आती हैं, जबकि विस्थापन के लिए भूमि और आर्थिक पैकेज की बातें की जा रही हैं।
768.55 हेक्टेयर CFR अधिकार का दिया हवाला
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत ग्राम देवझरअमली को प्राप्त सामुदायिक वन संसाधन अधिकार का भी मुद्दा उठाया है। उनके मुताबिक गांव को करीब 768.55 हेक्टेयर सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार प्राप्त है।
ग्रामीणों का सवाल है कि यदि विस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है तो मान्य सामुदायिक वन अधिकारों और अन्य वन अधिकारों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाएगी। उनका कहना है कि प्रशासन को विस्थापन के कानूनी आधार और संबंधित दस्तावेज ग्राम सभा तथा प्रभावित परिवारों के सामने स्पष्ट करने चाहिए।
संरक्षण के खिलाफ नहीं, अधिकारों की सुरक्षा की मांग
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि ग्रामीण वन्यजीव संरक्षण के विरोध में नहीं हैं। उनकी मांग है कि वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों के वैधानिक अधिकारों के बीच कानूनसम्मत और न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाई जाए।
उनका कहना है कि यदि विस्थापन को आवश्यक माना जा रहा है तो प्रशासन को ग्राम सभा और प्रभावित परिवारों के सामने इसकी वजह, कानूनी आधार, पुनर्वास पैकेज, अधिकारों की स्थिति और पूरी प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए।
21 सितंबर की बैठक में तय होगी आगे की दिशा
कलेक्टर रणवीर शर्मा ने बताया कि विस्थापन को लेकर 21 सितंबर को जिला स्तरीय समन्वय समिति की बैठक बुलाई गई है। इसमें संबंधित गांव के लोगों को भी आमंत्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि बैठक में जो निर्णय सामने आएगा, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
अब ग्रामीणों और प्रशासन की नजर 21 सितंबर को होने वाली इस बैठक पर टिकी है। बैठक में विस्थापन की प्रक्रिया, ग्रामीणों के अधिकार और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर क्या निर्णय होता है, यह आगे की दिशा तय करेगा।







