झीरम घाटी केस: 10 दोषियों को फांसी के बाद आदिवासी समाज ने उठाए सवाल, अब हाईकोर्ट जाएगा

जगदलपुर : झीरम घाटी मामले में विशेष NIA अदालत द्वारा 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद अब आदिवासी समाज के एक वर्ग ने फैसले को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। 16 सितंबर को जगदलपुर की विशेष NIA अदालत ने मामले में दोषी ठहराए गए 10 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी।

इसी के बाद जगदलपुर के परपा में आदिवासी समाज की बैठक हुई, जिसमें बस्तर संभाग के करीब 6 से 7 जिलों से समाज के प्रतिनिधि, प्रभावित परिवारों के सदस्य और अन्य लोग शामिल हुए। बैठक में समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने दावा किया कि जिन लोगों को इस मामले में दोषी ठहराकर सजा सुनाई गई है, वे झीरम की घटना में शामिल नहीं थे।

हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती देने की तैयारी

बैठक में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में गांव की बैठकों में ग्रामीणों की मौजूदगी सामान्य सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। उनके अनुसार, केवल किसी बैठक में शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति को नक्सली गतिविधियों से जोड़ना उचित नहीं माना जा सकता।

इसी दलील के आधार पर समाज ने मामले में आगे कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कही है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, समाज की ओर से पहले हाईकोर्ट में अपील किए जाने और जरूरत पड़ने पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की तैयारी है।

हर परिवार से ₹20 जुटाने का फैसला

कानूनी लड़ाई के लिए आदिवासी समाज ने चंदा जुटाने का निर्णय लिया है। इसके तहत हर गांव और प्रत्येक परिवार से 20 रुपये लिए जाने की बात कही गई है।

समाज के प्रतिनिधियों के मुताबिक, इसी राशि से कानूनी प्रक्रिया में होने वाले खर्च को जुटाया जाएगा। उनका कहना है कि हाईकोर्ट से अपेक्षित राहत नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई जारी रखने की तैयारी रहेगी।

‘जेल में बंद लोग निर्दोष’—प्रकाश ठाकुर

सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कहा कि प्रभावित परिवारों के साथ बैठक के दौरान झीरम मामले में आए फैसले पर चर्चा की गई। उनके मुताबिक, समाज इस फैसले से संतुष्ट नहीं है।

ठाकुर ने दावा किया कि कुछ ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर जेल में रखा गया है, जो घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं थे। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली बैठकों में शामिल होना अपने आप में नक्सली गतिविधि में शामिल होने का प्रमाण नहीं है।

उन्होंने कहा कि समाज अब इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देगा और वहां से राहत नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई जारी रखने की तैयारी है।

‘असली नक्सली बाहर हैं’—गंगा नाग

सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष गंगा नाग ने भी कहा कि प्रभावित परिवारों से चर्चा के बाद समाज ने कानूनी लड़ाई में साथ देने का फैसला किया है।

नाग का दावा है कि झीरम की घटना के पीछे वास्तविक रूप से जिम्मेदार लोग आज भी कानून की पकड़ से बाहर हैं, जबकि मामले में सजा पाने वाले लोग निर्दोष हैं। यह उनका और समाज के कुछ प्रतिनिधियों का दावा है, जिसका अंतिम निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया में ही होगा।

13 साल पुराने मामले में 10 दोषियों को मृत्युदंड

झीरम घाटी हमले का मामला वर्ष 2013 का है। विशेष NIA अदालत ने 5 सितंबर 2026 को मामले में 10 आरोपियों को दोषी ठहराया था और सजा पर फैसला सुरक्षित रखा था। इसके बाद 16 सितंबर को अदालत ने सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया।

अब आदिवासी समाज के एक वर्ग द्वारा फैसले के खिलाफ अपील की तैयारी किए जाने से इस बहुचर्चित मामले की कानूनी प्रक्रिया में एक और चरण जुड़ गया है। हालांकि, समाज की ओर से लगाए गए निर्दोष होने के दावे और मामले से जुड़े अन्य आरोपों का अंतिम फैसला अपीलीय न्यायालय की प्रक्रिया में होगा।

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