क्यों भूल गए थे अपनी शक्तियां पवनपुत्र हनुमान? जानिए उस श्राप की पूरी कहानी

 हनुमान जन्मोत्सव हर साल चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस साल यह पावन पर्व आज 2 अप्रैल को मनाया जा रहा है। शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज के ही दिन बजरंगबली का जन्म हुआ था। उन्हें बचपन से ही कई सिद्धियां और चमत्कारी शक्तियां प्राप्त थीं। उनके पास असीम शक्तियां थीं। वे पहाड़ उठा सकते थे, समुद्र लांघ सकते थे और सूरज को निगल सकते थे।

लेकिन, क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब वे अपनी इन शक्तियों को पूरी तरह भूल गए थे? आज हनुमान जन्मोत्सव के इस पावन मौके पर, चलिए जानते हैं कि कैसे बजरंगबली अपनी ही शक्तियों को भूल गए थे। साथ ही, ये भी जानेंगे कि उन्हें किन देवी-देवताओं से वरदान प्राप्त हुआ था।

यहां पढ़ें पौराणिक कथा

माता सीता का हरण हो चुका था और भगवान राम की वानर सेना उन्हें खोजते-खोजते विशाल समुद्र के किनारे आ पहुंची थी। सामने अथाह सागर था और वानर सेना की उम्मीदें टूटने लगी थीं। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इस विशाल समुद्र को पार करके लंका कैसे पहुंचा जाए।

तभी वहां सेना के सबसे वयोवृद्ध और ज्ञानी जामवंत जी आगे आए। उनकी नजर चुपचाप बैठे रामभक्त हनुमान पर गई। जामवंत जी जानते थे कि इस पूरी सेना में केवल एक ही योद्धा है जो इस समुद्र को लांघ सकता है और वो हैं स्वयं हनुमान जी। लेकिन, हनुमान जी अपनी शक्तियां भूल चुके थे। तब जामवंत जी ने उन्हें उनके जन्म और उन भूली हुई दिव्य शक्तियों की याद दिलाई।

क्यों अपनी शक्तियां भूल गए थे हनुमान जी? (सूर्य को निगलने की कथा)

जामवंत जी ने कथा सुनाते हुए कहा, “हे पवनपुत्र! आप माता अंजना और वानरराज केसरी के पुत्र हैं। जन्म से ही आपके भीतर देवताओं की असीम शक्तियां थीं।”

बचपन में बाल हनुमान बहुत ही नटखट और शरारती थे। एक दिन उन्हें बहुत तेज भूख लगी। उन्होंने आसमान में चमकते हुए लाल सूर्य को देखा और उसे कोई मीठा और रसीला फल समझ लिया। अपनी अद्भुत शक्तियों के बल पर वे उड़ान भरकर सूर्य को खाने के लिए अंतरिक्ष में पहुंच गए। अनजाने में ही सही, लेकिन बाल हनुमान (Bal Hanuman) ने अपनी शक्तियों का ऐसा प्रयोग किया जिससे पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया।

सूर्य वाले प्रसंग के बाद देवताओं ने हनुमान जी को कई वरदान दिए, जिससे वे और भी अधिक शक्तिशाली और चंचल हो गए। वे अक्सर अपनी शक्तियों के नशे में आश्रमों में जाकर तपस्या कर रहे ऋषि-मुनियों को परेशान करने लगे। उनकी इन रोज-रोज की शरारतों से तंग आकर भृगु और अंगिरा वंश के ऋषि-मुनियों ने उन्हें श्राप दिया कि, “तुम अपनी जिन शक्तियों पर इतना गर्व करते हो, उन्हें भूल जाओगे। ये शक्तियां तुम्हें तभी याद आएंगी, जब कोई तुम्हें तुम्हारे वास्तविक बल और महानता का स्मरण कराएगा।”

जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा- “का चुप साधि रहेहु बलवाना!” (हे बलवान! तुम चुप क्यों बैठे हो?)। जैसे ही जामवंत जी ने उन्हें राम काज (भगवान राम के काम) के लिए उनकी शक्तियों की याद दिलाई, हनुमान जी का श्राप टूट गया। उन्हें अपना खोया हुआ बल याद आ गया। देखते ही देखते उनका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया और वे ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष करते हुए एक ही छलांग में समुद्र पार कर लंका की ओर उड़ चले।

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