नवरात्र में बेटी बनकर मायके आती हैं मां दुर्गा! इस भोजपुरी भजन में बसी है लोकआस्था की मिठास

शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होने जा रहा है। नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में शामिल है। नौ दिनों तक भक्त मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा करते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में नवरात्रि से जुड़ी परंपराएं भी देखने को मिलती हैं।

मां दुर्गा को शक्ति और देवी स्वरूप में पूजने के साथ कई लोक परंपराओं में उन्हें घर की बेटी का दर्जा भी दिया जाता है। मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं। यही वजह है कि भक्त उनके स्वागत को बेटी के मायके आने जैसा मानते हैं और प्रेम, श्रद्धा व अपनत्व के साथ उनकी सेवा करते हैं।

इसी भावना को भोजपुरी के कई लोकगीतों और भजनों में बेहद खूबसूरती से व्यक्त किया गया है। इनमें ‘पहिले पइयां मां दुर्गा भवानी, झुन-झुन बाजेला मैया के पैंजनीया’ एक चर्चित लोक भजन है। इस भजन में मां के मायके आगमन, उनके श्रृंगार और सात बहनों के साथ झूला झूलने की कल्पना के जरिए भक्त और देवी के बीच मां-बेटी जैसा भाव दिखाया गया है।

आइए जानते हैं इस भजन की प्रमुख पंक्तियों का सरल हिंदी में भावार्थ।

मां दुर्गा के चरणों में पहला प्रणाम

‘पहिले पइयां मां दुर्गा भवानी,
झुन-झुन बाजेला मैया के पैंजनीया…’

इन पंक्तियों में भक्त सबसे पहले मां दुर्गा के चरणों में प्रणाम करते हैं। भजन में मां के मायके आने की कल्पना की गई है। उन्हें घर की बेटी की तरह सज-धजकर आते हुए देखा गया है।

मां जब घर के आंगन में कदम रखती हैं तो उनके पैरों में बंधी पायल की मधुर झंकार सुनाई देती है। भजन में पायल की यह आवाज मां के आगमन और घर में छाई खुशियों का प्रतीक बन जाती है।

मां के श्रृंगार का मनमोहक वर्णन

‘मैया के माथे सोहे बिंदिया कपरवा…’

इस पंक्ति में मां के सुंदर श्रृंगार का वर्णन मिलता है। उनके माथे पर सजी बिंदी की खूबसूरती को खास तौर पर बताया गया है।

भक्त मां को देवी के साथ-साथ बेटी के रूप में देखते हैं। जिस तरह मायके आई बेटी को सज-संवरकर देखकर परिवार के लोगों का मन प्रसन्न हो जाता है, उसी तरह भक्त मां के इस मनमोहक स्वरूप को देखकर भाव-विभोर हो जाते हैं।

मां के चरणों में दूसरी बार प्रणाम

‘दुसरे पइयां मां दुर्गा भवानी,
झुन-झुन बाजेला मैया के पैंजनीया…’

भजन में दूसरी बार मां के चरणों में नमन करने की बात आती है। मां के चरणों में बार-बार सिर झुकाना भक्त की गहरी श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।

मां की पायल की झंकार से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। भजन में इसकी तुलना उस खुशी से की गई है, जो किसी बेटी के मायके लौटने पर घर-आंगन में देखने को मिलती है।

सात बहनों के साथ झूला झूलती हैं मां

‘सातों बहिनिया मिलि झुलुआ झुलेली,
निमिया के डार मइया लागल झुलनवा…’

भजन की ये पंक्तियां लोक मान्यताओं और देवी के विभिन्न शक्ति स्वरूपों से जुड़ी कल्पना को सामने रखती हैं। इसमें मां दुर्गा को अपनी सात बहनों के साथ झूला झूलते हुए दिखाया गया है।

लोक भाव में इसकी कल्पना कुछ ऐसी है जैसे मायके आई बेटी अपनी सखियों और बहनों से मिलकर उनके साथ हंसी-खुशी के पल बिताती है और झूला झूलती है। उसी तरह मां दुर्गा भी अपनी सात बहनों के साथ नीम के पेड़ की डाल पर झूला झूल रही हैं।

देवी से ज्यादा बेटी का भाव क्यों खास है?

इस लोक भजन की सबसे खास बात यही है कि इसमें मां दुर्गा को सिर्फ शक्ति या देवी के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उन्हें घर की बेटी के रूप में महसूस किया गया है।

बेटी जब मायके आती है तो घर में उत्साह और खुशियां भर जाती हैं। इसी भाव को नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के आगमन से जोड़ा गया है। भक्तों के लिए मां का घर आना केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि अपनी बेटी के स्वागत जैसा भावनात्मक अवसर भी है।

भजन में दिखता है भक्ति और अपनत्व का अनोखा संगम

नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण और भजन संध्या जैसे आयोजनों में ऐसे लोक भजनों की गूंज सुनाई देती है। ‘पहिले पइयां मां दुर्गा भवानी’ भी इसी लोक आस्था और भावनात्मक जुड़ाव को सामने लाता है।

इस भजन में मां की पायल की झंकार, माथे की बिंदी, चरणों में प्रणाम और बहनों के साथ झूला झूलने जैसे प्रसंगों के जरिए भक्ति के साथ बेटी के प्रति प्रेम और अपनत्व का भाव व्यक्त किया गया है। यही वजह है कि नवरात्रि के दौरान इस तरह के लोकगीत भक्तों को भावनात्मक रूप से मां से जोड़ देते हैं।

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