जन्म के साथ ही रोता क्यों है नवजात? गर्भ से बाहर आते ही आत्मा के साथ क्या होता है, जानें धार्मिक मान्यता

जब एक बच्चे का जन्म होता है, तो उसका रोना अक्सर जीवन का संकेत माना जाता है। लेकिन क्या हो अगर वह रोना सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी हो? प्राचीन धर्म ग्रंथों में इससे कहीं ज्यादा रहस्यमय बातें बताई गई हैं।
गरुड़ पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में आत्मा को पूर्णता सजग बताया गया है। यह पूर्व जन्मों, सीखों और गलतियों को याद रखती है। गर्भ में आत्मा गहन चिंतन करती है, मानो एक नई शुरुआत की तैयारी कर रही हो। आत्मा के लिए नया जन्म आसान नहीं होता है।
बच्चा गर्भ से बाहर आते ही क्यों रोता है?गरुड़ पुराण के मुताबिक, यह बदलाव काफी कष्टकारी और पीड़ादायक होता है। गर्भ से बाहर निकलते ही आत्मा को एक तीव्र आघात लगता है। इस पल को असहनीय पीड़ा के रूप में वर्णित किया गया है।
गर्भ का सुख पल भर में गायब हो जाता है। आत्मा खोई हुई, दिशाहीन और विमुख महसूस करती है। यह सिर्फ एक शारीरिक घटना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अलगाव है। ऐसे में शिशु की पहली चीख कोई इत्तेफाकी बात नहीं है। यह इस गहरे और जबरदस्त अनुभव की प्रतिक्रिया हो सकती है।
उसका अतीत, उससे मिले सबक और जागरुकता सब कुछ एक पल में खत्म हो जाता है। यह कोई इत्तेफाक नहीं है। यह जीवन-चक्र का ही एक हिस्सा है। अगर यह भूलने की प्रक्रिया न हो, तो नया जीवन जीना मुश्किल होगा।
कुछ पल पहले तक आत्मा को सब कुछ याद था। अब उसे कुछ भी याद नहीं रहता। उस अचानक आए खालीपन से बेचैनी हो सकती है। वह चीख इसी नुकसान को बिना कहे बयां करती है। यह केवल जिंदगी की शुरुआत नहीं, बल्कि जागरूकता का अंत भी है।







