Custodial Death Case: बिलासपुर जेल मौत मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, DGP-गृह सचिव होंगे पेश

बिलासपुर : बिलासपुर के सेंट्रल जेल में हुई मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी और गृह सचिव को तलब किया है। प्रदेश के दोनों आला अफसर 4 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वर्चुअली मौजूद रहेंगे और सरकार का पक्ष रखेंगे।

बता दें कि बिलासपुर सेंट्रल जेल में 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की मौत हो गई थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के निर्देश पर मृतक के परिजनों को दिए गए 1 लाख रुपये के मुआवजे को सुप्रीम कोर्ट ने अपर्याप्त माना है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि हिरासत में मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करने और आपराधिक जांच के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

पत्नी और दो बेटियों ने दायर की SLP

मृतक की पत्नी लहरा बाई ताम्रकार और उनकी दो नाबालिग बेटियों की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी और गृह सचिव को 4 अगस्त 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं।

क्या है मामला

दरअसल, 18 जनवरी 2024 को बिलासपुर जिले की सीपत पुलिस ने श्रवण सूर्यवंशी को आबकारी एक्ट के तहत 6 लीटर कच्ची महुआ शराब के मामले में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उसे केंद्रीय जेल बिलासपुर भेज दिया गया। 21 जनवरी को उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

न्यायिक जांच में गंभीर चोट की पुष्टि

मृतक की मौत के बाद मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बिलासपुर के निर्देश पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत न्यायिक जांच कराई गई। 22 जुलाई 2024 की जांच रिपोर्ट में मृतक की मौत सिर में लगी गंभीर चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण होना बताया गया था। इसके बाद परिजनों ने जिम्मेदार पुलिस और जेल अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने तथा 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी। मृतक की पत्नी और 8 व 10 वर्ष की दो नाबालिग बेटियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर 2024 को याचिका का निराकरण करते हुए परिवार को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी

हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे पर असंतोष जताया। अदालत ने पाया कि शपथ पत्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि हिरासत में हुई मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करने अथवा आपराधिक जांच शुरू करने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित एक लाख रुपये के मुआवजे पर आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि अचानक हुई मौत से परिवार को हुई पीड़ा और क्षति की तुलना में यह राशि बेहद अपर्याप्त है।

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