आज है संत कबीर जयंती: पढ़ें कबीर के 8 सबसे प्रसिद्ध दोहे और उनका सरल अर्थ

आज संत कबीर दास की जयंती भी मनायी जाएगी। भारत की तपोभूमि पर अनेक संत, महात्माओं ने जन्म लिया है। इन्हीं में से एक भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में गिने जाने वाले संत कबीरदास जी हैं। संत कबीर ने अपना पूरा जीवन समाज सुधार के कार्यों में लगा दिया। इन्होंने लोगों को एकता के सूत्र का पाठ पढ़ाया। एक महान संत के साथ कबीर दास जी एक अच्छे लेखक और कवि भी थे। इनकी रचनाओं में मुख्य रूप से राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रज भाषा का समावेश देखने को मिलता है। कबीर दास जी भगवान राम के बहुत बड़े भक्त थे। उनका मत था कि जिस परमात्मा की तलाश में हम दर-दर भटकते रहते हैं वह तो हमारे अंदर है, बस हम अज्ञानवश उसे देख नहीं पाते। तो आइए जानते हैं संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे और उनके अर्थ के बारे में।

संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।।

(अर्थ – कबीर दास जी कहते हैं कि शिक्षक और भगवान अगर साथ में खड़े हैं तो सबसे पहलो गुरु के चरण छूने चाहिए, क्योंकि ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता भी गुरु ही दिखाते हैं।)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

(अर्थ- कबीर कहते हैं कि जब मैं इस दुनिया में बुराई खोजने गया, तो मुझे कुछ भी बुरा नहीं मिला और जब मैंने खुद के अंदर झांका तो मुझसे खुद से ज्यादा बुरा कोई इंसान नहीं मिला।)

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

(अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि धैर्य रखें धीरे-धीरे सब काम पूरे हो जाते हैं, क्योंकि अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।)

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोए, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए

(अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं व्यक्ति को हमेशा ऐसी बोली बोलनी चाहिए जो सामने वाले को अच्छा लगे और खुद को भी आनंद की अनुभूति हो।)

साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।।

(अर्थ- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमें मेरा गुजरा चल जाए, मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूं और आने वाले मेहमानों को भी भोजन करा सकूं।)

गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं, कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं।

(अर्थ- कबीर दास इस दोहे में कहते हैं कि, गुरु की आज्ञा को सिर आंखों पर रखना चाहिए और उनका पालन करना चाहिए। ऐसा करने वाले शिष्यों को तीनों लोकों में किसी का भय नहीं रहता।)

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

(अर्थ-  बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ कर संसार में कितने लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, लेकिन कोई ज्ञानी न हो सका। यदि कोई प्रेम का केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह से पढ़ ले तो वह वास्तविक रूप से प्रेम को समझकर सच्चा ज्ञानी हो जाता है।)

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

(अर्थ- कभी भी किसी भी काम को कल पर मत छोड़ो, जो कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो।)

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