जगन्नाथ मंदिर का अनसुलझा रहस्य! 7 बर्तनों में सबसे ऊपर का भोजन पहले कैसे पक जाता है?

पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपने आप में ही खास माना जाता है और इससे जुड़ी कई ऐसे रहस्य हैं जो इस मंदिर को और ज्यादा महत्वपूर्ण बनाते हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में से एक रहस्य है, इसमें बनाई जाने वाली रसोई का। यह एक ऐसा धाम है, जो सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं है बल्कि रहस्यों और चमत्कारों का अद्भुत संगम भी माना जाता है।
उड़ीसा के पवित्र पुरी धाम की यह वही स्थान है जहां पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा एक साथ विराजमान हैं और यहां रथ यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालुओं भी भीड़ इकठ्ठा होती है। इस धाम की सबसे अनोखी बात यहां की रसोई में तौयार होने वाला जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद माना जाता है। यह रसोई सिर्फ भोजन बनाने का स्थान नहीं है बल्कि भक्ति, सेवा और चमत्कार का जीवंत उदाहरण भी है। यहां रोज लाखों लोगों के लिए भोजन पकाया जाता है। फिर भी कभी भी किसी के लिए न तो खाना कम नहीं पड़ता है और न ही कभी प्रसाद बचता है। यही नहीं इसका एक रहस्य यह भी है कि इस रसोई में साथ बर्तनों को एक के ऊपर एक रखा जाता है और सबसे ऊपर वाले बर्तन में भोजन सबसे पहले पक जाता है। आइए आपको बताते हैं एक के ऊपर एक रखे 7 बर्तनों और उसमें पकने वाले भोजन का रहस्य।
सात बर्तनों में पकने वाले भोजन का रहस्य
जगन्नाथ मंदिर की रसोई में सात मिट्टी के बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर जब खाना पकाया जाता है तो सबसे ऊपर रखे बर्तन का भोजन सबसे पहले पक जाता है। विज्ञान भी इस रहस्य को अब तक समझ नहीं पाया है। यहां की रसोई में रोज भगवान जगन्नाथ के भोग के रूप में कई पकवान बनाए जाते हैं। यह कोई मामूली रसोई नहीं बल्कि इसमें रोज लाखों लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाता है।
इसकी विशेष बात यह है कि कभी भी किसी के लिए खाना कम नहीं पड़ता और ना ही यहां पर बना हुआ प्रसाद बचता है। यहां सात मिट्टी के बर्तन एक के ऊपर एक रखकर खाना बनाया जाता है जिसमें सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना सबसे पहले और नीचे का खाना सबसे बाद में बनकर तैयार होता है। भक्त इसे भगवान की दिव्य शक्ति का चमत्कार ही मानते हैं। इस रसोई में सारा भोजन मिट्टी के बर्तनों में ही बनता है और इन बर्तनों का इस्तेमाल दोबारा नहीं किया जाता है। इन बर्तनों में पकने वाले भोजन के क्रम का रहस्य आज भी बना हुआ है।
जगन्नाथ पुरी की रसोई का भोजन क्यों माना जाता है विशेष
मंदिर का ये रसोईघर ना केवल खाना बनाने के लिए है बल्कि भक्ति और सेवा का प्रतीक भी है। यहां के पुजारी पूरी श्रद्धा और संयम के साथ खाना बनाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यहां का खाना केवल शरीर ही नहीं बल्कि आत्मा को भी पोषण देता है। जगन्नाथ पुरी का एक और नियम है कि यहां अगर कोई व्यक्ति प्रसाद ग्रहण कर रहा हो और किसी दूसरे व्यक्ति को पत्तल या जगह ना मिल रही हो तो वह भी उसी पत्तल में खाने लगता है। यहां के महाप्रसाद को कभी भी जूठा नहीं माना जाता है। यहां तक कि अगर प्रसाद ग्रहण करते समय कोई पशु भी आ जाए तो उसे भी दूर नहीं भगाया जाता है और वह भी उसी पत्तल में प्रसाद ग्रहण करता है।
भोजन बनाने की प्रक्रिया भी है अलग
इस भोजन को बनाते समय यहां के रसोईए पूर्ण मौन धारण करते हैं और यह मानकर भोजन पकाते हैं कि देवी लक्ष्मी उनके साथ ही हैं। भोजन को आबादा कहा जाता है और इसमें 56 व्यंजन शामिल होते हैं। इसका मुख्य हिस्सा दालमा को कहा जाता है, जो एक पौष्टिक दाल और सब्जी का मिश्रण होता है। इस रसोई में प्याज, लहसुन, आलू या टमाटर की अनुमति नहीं होती है और इन्हें तामसिक श्रेणी में शामिल किया जाता है। इस रसोई में भोजन बनाने के लिए पानी दो प्राचीन कुओं से आता है जिसे गंगा और यमुना का जल माना जाता है।







