शिव की आराधना और राम की प्रतिज्ञा, जानें महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक मर्म

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण, (सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या)। दिन और रात्रि के अनवरत चक्र पर आधरित होकर समय सतत आगे बढ़ता जाता है। महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में रात और दिन को कालाग्नि की दो लकड़ियां कहा गया है- रात्रिदिवेन्धनेन। श्रीमद्भगवद्गीता में छह महीने के दिन और छह महीने की रात्रि का देवताओं के दिन-रात के रूप में निरूपण है। काल के इस विज्ञान में महाकाल शिव की उपस्थिति विशेष अर्थ भर देती है। कालाधीन विश्व में काल के परे उसका नियामक होकर विराजमान शिवतत्व हमारी ऋषि परंपरा के केंद्र में विद्यमान है। समस्त विद्याओं के ईश्वर तथा समस्त जगत के अधिपति, वेद के ब्राह्मी चेतना के रक्षक सच्चिदानंद शिव से वेद कल्याण हेतु प्रार्थना करते हैं-
शिवो मे अस्तु सदाशिवोऽम्॥”भगवान शिव असाधारणता के पर्याय हैं। तमोगुण के अभिमानी देवता होते हुए भी वह परमप्रकाशरूप हैं। सर्वविध अमांगल्य को अंगीकार करके भी परम मंगलमय हैं और मुंडमाल-चिताभस्म जैसी वस्तुओं को धारण करके भी पतितपावन हैं। शिव की विलक्षणता को ही प्रकट करते हुए भानुकोटिप्रकाश महादेव का सबसे बड़ा पर्व कहलाता है- महाशिवरात्रि। सामान्यतया रात्रि अंधकार से परिभाषित होती है, किंतु शिव के दिव्य संयोग से फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि शिवत्व के प्रकाश को व्यक्त करने वाली बन गई है। एक ऐसा प्रकाश, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी भक्ति-मणि का प्रकाश कहते हैं, जिसे घी-बाती की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह ज्योति आंधी-तूफान से भी नहीं बुझती। श्रीरामचरितमानस की चौपाइयां हैं-
अलौकिक शिव की लौकिक लीलाओं में निहित कल्याण और लोकरंजन के सबसे सुंदर दृश्य गोस्वामी तुलसीदास की लेखनी से व्यक्त होते हैं। श्रीरामचरितमानस में भगवान शिव की वंदना करते हुए वे मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम से उनको संबद्ध करते हैं- ‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के।’ इतना ही नहीं, श्रीरामचरित विषयक प्रश्न से आरंभ श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी जी रामचरित से पहले शिवचरित रखते हैं। भरद्वाज महर्षि के प्रश्न का उत्तर देते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मैने पहले शिवचरित सुनाकर तुम्हारी परीक्षा ली है। शिवचरित का श्रद्धापूर्वक श्रवण ही रामचरित सुनने की अधिकारिता का प्रमाण है।







