गणपति विवाह की अनसुनी कहानी: तुलसी के श्राप से लेकर रिद्धि-सिद्धि तक का पूरा रहस्य

गणेश जी को हिंदू धर्म में प्रथम पूजनीय भगवान के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं सभी बाधाओं को दूर करने वाला देवता कहा जाता है और इनकी पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है। इन्हें बाधाओं को दूर करने वाले और नई शुरुआत के रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
जिस तरह से उनके जन्म से लेकर उनके हाथी के सिर का स्वरूप धारण करने की कथाएं प्रचलित हैं और ये शिव महापुराण में वर्णित हैं, ठीक उसी तरह उनकी शादी को लेकर भी पुराणों में कई कहानियां सामने आती हैं। कई लोगों के मन में एक सवाल यह भी आता है कि गणपति का विवाह किससे हुआ था और उनकी शादी से जुड़ी कौन सी कथाएं हैं जिनसे आज भी कई लोग अनजान हैं। कई पुराणों में गणपति के विवाह को लेकर दो शादियों का जिक्र मिलता है, तो कई लोग इससे ज्यादा विवाह के बारे में बताते हैं। आइए आपको बताते हैं गणपति की पत्नियों और उनकी शादी से जुड़े रहस्यों के बारे में। गणपति की कितनी पत्नियां थीं? अगर हम पौराणिक कथाओं की बात करें तो गणपति की मुख्य रूप से दो ही पत्नियां थीं रिद्धि और सिद्धि। ये केवल उनकी पत्नियां ही नहीं हैं, बल्कि मानवीय समृद्धि के दो पहलुओं का प्रतीक भी मानी जाती हैं।
जहां एक तरफ रिद्धि भौतिक सुख-समृद्धि और सांसारिक सफलता को नियंत्रित करती हैं, वहीं सिद्धि आध्यात्मिक ज्ञान और आंतरिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये दोनों साथ मिलकर गणपति की उस भूमिका को दिखाती हैं जो भौतिक और आध्यात्मिक दुनिया के बीच एक पुल का काम करती है और सांसारिक कार्यों में दिव्य ज्ञान का सामंजस्य बिठाती है।
गणपति का विवाह कैसे हुआ था?
शिव महापुराण में गणपति के विवाह की एक कहानी तुलसी जी के एक प्रस्ताव से शुरू होती है। एक बार तुलसी जी भगवान गणेश के ध्यान-मग्न रूप पर मोहित हो गई थीं। गणेश जी, जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लिया था, ने विनम्रतापूर्वक उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया। निराश और क्रोधित होकर, तुलसी जी ने गणेश जी को दो विवाह करने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण आगे चलकर उनका विवाह रिद्धि और सिद्धि से हुआ।
शिव पुराण में गणपति विवाह को लेकर क्या लिखा है?
शिव पुराण की रुद्र संहिता के कुमार खंड के अध्याय 19 और 20 में श्री गणेश की शादी का किस्सा विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार एक बार माता-पिता पार्वती और भगवान शिव ने अपने बेटों श्री गणेश और कार्तिकेय को बुलाया और कहा-‘जो भी पहले पूरी धरती का चक्कर लगाकर आएगा उसका विवाह किया जाएगा।
उस समय कार्तिकेय जल्दी से अपने वाहन में सवार होकर पूरी धरती का चक्कर लगाने निकल पड़े और गणपति सिर्फ अपने माता-पिता की परिक्रमा करके एक ही स्थान पर बैठ गए। ऐसे में जब गणपति से पूछा गया कि वो धरती का चक्कर क्यों नहीं लगा रहे हैं, तब उन्होंने बहुत सहजता से कहा कि उनके माता-पिता उनका सर्वस्व हैं।
वहीं जब कार्तिकेय संपूर्ण पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस आए तब तक गणपति के विवाह की योजना प्रजापति विश्वरूप की बेटियों रिद्धि और सिद्धि से बनाई जा चुकी थी। कार्तिकेय इस बात से नाराज होकर कोंच पर्वत चले गए और आजीवन कुंवारे रहने का संकल्प लिया। इसी वजह से आज भी कार्तिकेय कुमार कार्तिकेय कहे जाते हैं और गणपति की दो पत्नियां रिद्धि-सिद्धि हैं।
क्या रिद्धि-सिद्धि के अलावा गणपति की अन्य पत्नियां भी थीं?
जिस समय गणेश जी रिद्धि-सिद्धि से विवाह के लिए बारात लेकर जा रहे थे उस समय उन्हें रास्ते में श्री मिलीं जो श्री गंगा के तट पर साधना कर रही थीं।
उनसे गणपति ने पूछा कि वो किसके लिए पूजा कर रही हैं, तो श्री ने उत्तर दिया कि वो गणेश जी के लिए साधना कर रही हैं। उस समय गणपति ने श्री को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया। श्री को सबसे पहली पत्नी माना जाता है। दूसरी पत्नी यानी कि विश्वरूप जी के मुनिम की दो बेटियां पुष्टि और तष्टि को भी गणपति की पत्नी का दर्जा दिया जाता है। इस प्रकार से गणपति की पांच पत्नियां श्री, तुष्टि, पुष्टि, रिद्धि और सिद्धि को माना जाता है।
पौराणिक कथाओं और पुराणों के अनुसार मुख्य रूप से गणपति की दो पत्नियां थीं, लेकिन उनकी अन्य तीन पत्नियों को भी गणपति ने पत्नी रूप में स्वीकार किया था।







