निर्माण कार्यों पर घमासान, अध्यक्ष ने उठाया भ्रष्टाचार का मुद्दा, लेकिन पार्षद के प्रमाण से उलझा मामला

 खैरागढ़ : नगर पालिका परिषद खैरागढ़ में नाली और सीसी रोड निर्माण को लेकर उठा विवाद अब दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. मामला जितना तकनीकी दिख रहा है, उतना ही अंदरूनी तालमेल की कमी और राजनीतिक असहजता भी इसमें झलक रही है. नगर पालिका अध्यक्ष गिरिजा चंद्राकर ने जिन दो निर्माण कार्यों में फर्जी भुगतान का आरोप लगाते हुए शिकायत की है, उन्हीं कार्यों को उनकी ही पार्टी की वार्ड पार्षद पहले ही पूरा और संतोषजनक बता चुकी हैं.

पूरा विवाद वार्ड क्रमांक 6 के दो कामों से जुड़ा है, नाली निर्माण और सीसी रोड. अध्यक्ष का कहना है कि 3 मार्च 2026 को इन कार्यों का भुगतान कर दिया गया, जबकि दस्तावेजों में काम 12 मार्च से शुरू दिखाया गया है. यही आधार बनाकर उन्होंने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता और संभावित भ्रष्टाचार का मामला बताया है. नियमों के मुताबिक भुगतान कार्य की प्रगति के अनुसार होना चाहिए, ऐसे में “पहले भुगतान, बाद में काम” का आरोप सीधे सवाल खड़े करता है.

लेकिन जब इस मामले की तह में जाया गया तो तस्वीर कुछ और ही नजर आई. वार्ड की पार्षद मोनिका रजक ने पहले ही लिखित रूप में प्रमाणित कर रखा है कि ये दोनों काम दिसंबर 2025 में पूरे हो चुके थे और 15 जनवरी तक उनका समापन हो गया था. उन्होंने न सिर्फ काम की गुणवत्ता और स्थान की पुष्टि की, बल्कि यह भी लिखा कि किसी भी शिकायत की जिम्मेदारी उनकी होगी. इसी आधार पर उन्होंने भुगतान की अनुशंसा भी की थी.

इन दस्तावेजों के बाद उलझा मामला

यहीं से मामला उलझ जाता है. एक तरफ अध्यक्ष का दावा है कि काम बाद में शुरू हुआ, दूसरी तरफ पार्षद और स्थानीय स्तर के दस्तावेज बताते हैं कि काम पहले ही पूरा हो चुका था. यानी सवाल अब यह नहीं रह गया कि काम हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि कागजों में दर्ज तारीखें सही हैं या शिकायत की आधारशिला ही कमजोर है.

क्या है हकीकत?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यह उठ रहा है कि क्या शिकायत करने से पहले अध्यक्ष ने अपने ही दल की पार्षद से इस बारे में चर्चा नहीं की? अगर पार्षद ने पहले ही काम की पुष्टि कर दी थी, तो बिना समन्वय सीधे शिकायत करना अब शहर में चर्चा का विषय बन गया है. इसे लेकर राजनीतिक हलकों में भी तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. शिकायत दर्ज होने के तुरंत बाद प्रशासन हरकत में आया और अधिकारियों की टीम ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया. अब जांच इस बात पर टिकी है कि हकीकत किसके साथ है, फाइलों में दर्ज तारीखों के साथ या जमीन पर दिख रहे काम के साथ. फिलहाल खैरागढ़ में यह मामला एक उदाहरण बन गया है कि कैसे एक ही काम पर दो अलग-अलग दावे पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में ला सकते हैं. अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर हैं, जो तय करेगी कि यह मामला भ्रष्टाचार का है या फिर समन्वय की कमी से उपजा विवाद.

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