दशहरे पर शमी वृक्ष और शस्त्रों की पूजा क्यों की जाती है? जानिए इस परंपरा के पीछे क्या है धार्मिक मान्यता

विजयादशमी सनातन धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसे बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम द्वारा रावण के वध की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है। वहीं कई जगहों पर शस्त्र पूजा की परंपरा भी निभाई जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि विजयादशमी पर शस्त्रों की पूजा क्यों की जाती है और इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं?

कब मनाया जाएगा दशहरा?

शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों के बाद आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी मनाई जाती है। दिए गए पंचांग के अनुसार, 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर दशमी तिथि शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में 20 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा। इस दिन देश के कई हिस्सों में रावण दहन भी किया जाता है।

रावण दहन का शुभ समय

विजयादशमी पर रावण दहन के लिए प्रदोष काल और सूर्यास्त का समय उत्तम माना जाता है। पंचांग के अनुसार, 20 अक्टूबर को सूर्यास्त शाम 5:47 बजे होगा। ऐसे में रावण दहन का शुभ समय शाम 5:47 बजे से रात 8:23 बजे तक माना जाएगा।

शस्त्र पूजा का महत्व

सनातन परंपरा में शस्त्रों को केवल हथियार नहीं माना गया है। इन्हें शक्ति, साहस, आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। शस्त्र पूजा के पीछे भाव यह है कि शक्ति का इस्तेमाल अन्याय के खिलाफ और धर्म की रक्षा के लिए किया जाए। इसी वजह से विजयादशमी पर सैनिक, पुलिसकर्मी और सुरक्षा से जुड़े लोग हथियारों की पूजा करते हैं। वहीं कारीगर, किसान और दूसरे पेशों से जुड़े लोग अपने काम के औजारों की पूजा भी करते हैं।

महाभारत से जुड़ी मान्यता

शस्त्र पूजा की परंपरा को महाभारत काल से भी जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान हथियार शमी के पेड़ के नीचे छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद अर्जुन ने इसी पेड़ से अपने शस्त्र निकाले और राजा विराट के राज्य की रक्षा के लिए कौरवों की सेना का सामना किया। यह घटना आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से जुड़ी मानी जाती है। इसी वजह से कई क्षेत्रों में विजयादशमी पर शमी वृक्ष और शस्त्रों की पूजा की जाती है।

राम और दुर्गा की विजय

विजयादशमी का संबंध भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीराम ने रावण का वध कर अधर्म का अंत किया। वहीं देवी महात्म्य की कथा में मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध का वर्णन मिलता है। दोनों प्रसंग अन्याय और नकारात्मक शक्तियों पर विजय का संदेश देते हैं। इसी भावना के साथ शस्त्र पूजा शक्ति के सही और धर्मसम्मत इस्तेमाल का संकल्प भी मानी जाती है।

अपराजिता और शमी पूजा

विजयादशमी के दिन ईशान कोण में जाकर अपराजिता पौधे की पूजा करने और शमी के पेड़ के दर्शन की भी परंपरा बताई जाती है। धार्मिक मान्यता में इसे विजय और सफलता से जोड़कर देखा जाता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button