आखिर क्यों अन्य देवी-देवताओं से इतनी अलग हैं भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां? वजह जानकर उड़ जाएंगे होश

उड़ीसा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का रूप सचमुच काफी अनोखा और अद्भुत है। जहां हिंदू धर्म से जुड़ी अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां इंसानी रूप में काफी सुंदर और पूरी तरह से गढ़ी हुई होती हैं, वहीं भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी से दिखाई देती है, जिसमें इनके हाथ-पैर नहीं हैं, बड़े-बड़े सिर हैं और गोल-गोल आंखें हैं। आखिर क्यों भगवान जगन्नाथ का स्वरूप अन्य सभी देवी-देवताओं से अलग है, आइए जानते हैं?
भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का दूसरा नाम है, जो अपने भक्तों के प्रति प्रेम और संरक्षण का भाव रखते हैं। श्री जगन्नाथ और उनके भाई-बहन की मूर्तियां नीम की लकड़ी के तने पर कुशलतापूर्वक तराशी और रंगी जाती हैं। जहां हिंदू धर्म के अन्य देवी-देवताओं को सुंदरता के साथ मनुष्य रूप में चित्रित किया जाता है, वहीं जगन्नाथ भगवान की मूर्ति इससे उलट है।
भगवान जगन्नाथ के चेहरे और छाती को सहारा देने वाला स्तंभ आपस में जुड़ा हुआ सा लगता है। विशाल गोल चेहरा जो अनादि (बिना शुरुआत)और अनंत (बिना अंत) का प्रतीक है। उनकी विशाल आंखें चंद्रमा और सूर्य का प्रतीक हैं। पैर, गर्दन और कान नहीं हैं, लेकिन मुख्य ठूंठ के दोनों ओर दो और ठूंठ भगवान के हाथों का काम करते हैं।
भगवान जगन्नाथ की विशाल आंख किसका प्रतीकभगवान जगन्नाथ की बड़ी-बड़ी आंखें उनकी मूर्ति की सबसे खास और मनमोहक विशेषताओं में से एक है। उनकी बड़ी और गोल आंखें सर्वव्यापी दृष्टि का प्रतीक हैं, जो यह दर्शाती है कि, वे सभी प्राणियों को देखते और अपनाते हैं, चाहें उनकी सामाजिक स्थिति, जाति या धर्म कुछ भी क्यों न हो।
भगवान जगन्नाथ के रूप से जुड़ी पौराणिक कथाप्राचीन काल में मालवा देश के राजा इंद्रद्युम्न था। वे भगवान विष्णु के परम भक्त होने के साथ श्रद्धा भाव से उनकी पूजा करते थे। एक दिन उन्होंने सपने में देखा कि, भगवान नीलमाधव एक गुफा में निवास करते हैं। उन्होंने अपने दूतों को उनको खोजने के लिए भेजा।
विद्यापति को भगवान नीलमाधव एक शबर (वनवासी) परिवार में दर्शन हुए। राजा इंद्रद्युम्न जब वहां पहुंचे, तब तक नील माधव अंतर्ध्यान हो चुके थे। लेकिन उन्हें आकाशवाणी हुई जिसमें बताया गया कि भगवान विष्णु एक खास रूप में प्रकट होंगे।
एक दिन समुद्र के किनारे एक रहस्यमय विशाल काष्ठदंड (नीम की लकड़ी) बहकर किनारे आई। आकाशवाणी हुई कि इसी लकड़ी से भगवान की मूर्ति बनानी है। तब एक वृद्धि कारीगर मूर्तियां बनाने के लिए आया। उसने शर्त रखी कि जब तक वह कक्ष से बाहर न आए कोई अंदर नहीं आएगा।
राजा ने बूढ़े कारीगर की बात को स्वीकार कर लिया, लेकिन 21 दिन बाद भी कारीगर कक्ष से बाहर नहीं आया, तो रानी ने चिंता में दरवाजा खुलवा दिया। तभी बूढ़ा कारीगर गायब हो गया और मूर्तियां अधूरी रह गई थी, जिसमें भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा शामिल है। इन्हीं अधूरी मूर्तियों की पूजा आज भी बड़ी श्रद्धा के साथ की जाती है।
भगवान जगन्नाथ के इस अनोखे स्वरूप की वजह इस पौराणिक कहानी को भी बताया जाता है। हालांकि उनके स्वरूप से जुड़ी ऐसी कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर लोक मान्यताओं पर आधारित हैं।







