हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, प्रेम विवाह करने वाले जोड़े को SP देंगे सुरक्षा

बिलासपुर :  अंतरजातीय विवाह करने वाले नवदंपति ने ऑनर किलिंग और झूठे अपराध में फंसाने की दी जा रही धमकी और आशंका को लेकर हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सुरक्षा प्रदान करने की मांग की है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविेंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में याचिका की सुनवाई हुई। डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ कोरबा के एसपी और संबंधित थाना प्रभारी को याचिकाकर्ता नवदंपति को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा, याचिकाकर्ताओं को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचे और उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की विधिवत रक्षा की जाए। याचिकाकर्ताओं द्वारा कोई शिकायत किए जाने की स्थिति में, उसकी तुरंत जांच की जाए और कानून के अनुसार आवश्यक निवारक उपाय किए जाएं। डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता पति-पत्नी के रिश्तेदार जिन्हें पक्षकार बनाया गया है, को निर्देशित करते हुए कहा, वे याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करें।

पढ़िए क्या है मामला?

छत्तीसगढ़ कोरबा जिले के कटघोरा निवासी चिंटू अग्रवाल व अंजलि शर्मा ने अधिवक्ता विवेक कुमार अग्रवाल के जरिए छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सुरक्षा प्रदान करने की मांग की है। रिट याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विवेक कुमार अग्रवाल ने डिवीजन बेंच को बताया, याचिकाकर्ता कानूनी रूप से विवाहित पति-पत्नी हैं, जो विवाह से पहले लंबे समय से एक-दूसरे को जानते थे, पड़ोसी होने के नाते, और उनके बीच आपसी सहमति से प्रेम संबंध विकसित हुआ था। हालांकि, अंजलि शर्मा के परिवार ने उनके विवाह का कड़ा विरोध किया और इसे रोकने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। इस विरोध के कारण, याचिकाकर्ताओं ने स्वेच्छा से अपना पैतृक स्थान छोड़ दिया और अपनी इच्छा और सहमति से 27 फरवरी 2026 को आर्य समाज, जयपुर, राजस्थान में विवाह कर लिया। इसके बाद, उन्होंने जयपुर में सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपने विवाह का विधिवत पंजीकरण कराया और अपने वैवाहिक स्थिति की पुष्टि करते हुए एक शपथ पत्र निष्पादित किया। विवाह के समय, दोनों याचिकाकर्ता बालिग थे, और इस प्रकार कानून के तहत वैध विवाह करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम थे।

ऑनर किलिंग और झूठे अपराध में फंसाने से भयभीत हैं याचिकाकर्ता पति-पत्नी

अधिवक्ता विवेक अग्रवाल ने कोर्ट को बताया, उनकी शादी के बाद,याचिकाकर्ता पति पत्नी को, पत्नी अंजलि के परिवार के सदस्यों से लगातार धमकियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें ऑनर किलिंग और झूठे आपराधिक मामलों में फंसाए जाने की धमकियां शामिल हैं। संबंधित पुलिस अधिकारियों को लिखित शिकायतें सौंपने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे याचिकाकर्ताओं को अपने जीवन और स्वतंत्रता के लिए निरंतर भय का सामना करना पड़ रहा है। ये धमकियां याचिकाकर्ताओं के मित्रों और सहयोगियों तक भी पहुंच गई हैं।

अधिवक्ता अग्रवाल ने बताया, इससे पहले, याचिकाकर्ताओं ने इस न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी, जिसे आवश्यक पक्षों को पक्षकार बनाने के बाद पुनः याचिका दायर करने की स्वतंत्रता के साथ वापस ले लिया गया था। इन परिस्थितियों में, याचिकाकर्ताओं को अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और राज्य अधिकारियों को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित निर्देश देने हेतु इस न्यायालय में याचिका दायर करने के लिए विवश होना पड़ा है।

राज्य सरकार के अधिवक्ता ने कहा, इन आराेपों पर नहीं बनता संज्ञेय अपराध

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए शासकीय अधिवक्ता ने कहा, याचिका में लगाए गए आरोपों के आधार पर कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। याचिकाकर्ताओं ने किसी विशिष्ट घटना, तिथि, समय या ऐसे किसी भी महत्वपूर्ण विवरण का खुलासा नहीं किया है जो संज्ञेय अपराध का गठन करता हो, और धमकी के आरोप अस्पष्ट, सामान्य और निराधार हैं। अतः, यह याचिका योग्यताहीन होने के कारण खारिज किए जाने योग्य है।

हाई कोर्ट ने कहा, याचिकाकर्ता पति-पत्नी को है सुरक्षा का अधिकार

रिट याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और उन्होंने अपनी शादी बालिग अवस्था में संपन्न की है।

अपनी स्वतंत्र इच्छा और सहमति से। दो वयस्क व्यक्तियों को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने कहा, सर्वोच्च न्यायालय ने माना है, अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह राष्ट्रीय हित में हैं और ऐसे दंपतियों को धमकियों और उत्पीड़न से सुरक्षा का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए अभिशाप है

अनुच्छेद 17 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की है, जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए अभिशाप है और इसका जल्द से जल्द नाश हो जाना ही बेहतर है। वास्तव में, यह राष्ट्र को ऐसे समय में विभाजित कर रही है जब हमें राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का एकजुट होकर सामना करना होगा। इसलिए, अंतरजातीय विवाह वास्तव में राष्ट्रीय हित में हैं, क्योंकि इनसे जाति व्यवस्था का नाश होगा। हालांकि, देश के कई हिस्सों से परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं, अंतरजातीय विवाह करने वाले युवा लड़के-लड़कियों को हिंसा की धमकी दी जा रही है या उन पर हिंसा की जा रही है।

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सुुरक्षा प्रदान करने एसपी को दिया निर्देश

डिवीजन बेंच ने कहा, याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने जीवन और स्वतंत्रता के खतरे के संबंध में व्यक्त की गई आशंका को देखते हुए, यह न्यायालय पुलिस अधीक्षक, थाना प्रभारी को यह निर्देश देना उचित समझता है, याचिकाकर्ताओं को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचे और उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की विधिवत रक्षा की जाए। यह भी निर्देश दिया जाता है, याचिकाकर्ताओं द्वारा कोई शिकायत किए जाने की स्थिति में, उसकी तुरंत जांच की जाए और कानून के अनुसार आवश्यक निवारक उपाय किए जाएं। डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता पति-पत्नी के रिश्तेदार जिन्हें पक्षकार बनाया गया है, को निर्देशित करते हुए कहा, वे याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करें।

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